Sunday, July 10, 2016

कविता

कविता लिखना किसी इंसान के बस की बात नहीं है
कविता ख़ुद ही अपने आप को लिखती है
इक ज़रिया है बस हम तो
कविता ख़ुद ही ख़ुद को आईना में दिखती है

यह ख़ुद अपनी ज़ुबां चुनती है
लफ्ज़ अपने ख़ुद ही ढूँढ़ती है
कोशिश कर लेना तुम कभी
झूठ लिखते ही ये टूटती है

देर रात यह सपने में आती
मन के दरवाज़े पर दस्तक देती
लिफ़ाफ़े में बंद चिट्ठी में
अपने आप को तुम्हें दे जाती
लिखावट काग़ज़ पर तुम्हारी है बेशक़
पर कलम में सियाही तो वो ही भर जाती

कभी यूँ ही शाम को मिलने आती
खिड़की के पास बैठ चाय की चुस्कियाँ लगाती
रोम रोम में इक महक सी भर जाती है
दिल की धड़कनें कानों तक गूँज जाती है
बाहर की खिड़की खोलते खोलते
यह रूह के दरवाज़े खोल जाती है

एक बार कविता हर किसी को छूने आती है
जब टुटा हो दिल प्यार में, तो यह कुछ ज़्यादा जी लुभाती है
जब हाथ बढ़ाए तुम्हारी ओर, झट से थाम लेना, साहीर
यह बार बार गले नहीं लगती है।